वाल्मीकि रामायण 5.58.132
अस्याहं दर्शनाकांक्षी प्राप्तस्त्वद्भवनं विभो ।मारुतस्यौरसः पुत्रो वानरो हनुमानहम्॥
asyāhaṃ darśanākāṃkṣī prāptastvadbhavanaṃ vibho |mārutasyaurasaḥ putro vānaro hanumānaham ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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