वाल्मीकि रामायण 5.58.135
वसतो ऋश्यमूके मे पर्वते विपुलद्रुमे ।राघवो रणविक्रान्तो मित्रत्वं समुपागतः॥
vasato ṛśyamūke me parvate vipuladrume |rāghavo raṇavikrānto mitratvaṃ samupāgataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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