वाल्मीकि रामायण 5.58.150
ततस्तस्य वचः श्रुत्वा पुच्छं समन्ततः ।वेष्टितं शणवल्कैश्च जीर्णैः कार्पासजैः पटैः॥
tatastasya vacaḥ śrutvā pucchaṃ samantataḥ |veṣṭitaṃ śaṇavalkaiśca jīrṇaiḥ kārpāsajaiḥ paṭaiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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