वाल्मीकि रामायण 5.58.164
ततः पर्वतमासाद्य तत्रारिष्टमहं पुनः ।प्रतिप्लवनमारेभे युष्मद्दर्शनकाङ्क्षया॥
tataḥ parvatamāsādya tatrāriṣṭamahaṃ punaḥ |pratiplavanamārebhe yuṣmaddarśanakāṅkṣayā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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