वाल्मीकि रामायण 5.58.165
ततः पवनचन्द्रार्कसिद्धगन्धर्वसेवितम् ।पन्थानमहमाक्रम्य भवतो दृष्टवानिह॥
tataḥ pavanacandrārkasiddhagandharvasevitam |panthānamahamākramya bhavato dṛṣṭavāniha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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