वाल्मीकि रामायण 5.58.17
रामस्य च मया साह्ये वर्तितव्यमरिन्दम ।रामो धर्मभृतां श्रेष्ठो महेन्द्रसमविक्रमः॥
rāmasya ca mayā sāhye vartitavyamarindama |rāmo dharmabhṛtāṃ śreṣṭho mahendrasamavikramaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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