वाल्मीकि रामायण 5.58.23
एवमुक्तः सुरसया प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ।विवर्णवदनो भूत्वा वाक्यं चेदमुदीरयम्॥
evamuktaḥ surasayā prāñjaliḥ praṇataḥ sthitaḥ |vivarṇavadano bhūtvā vākyaṃ cedamudīrayam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें