वाल्मीकि रामायण 5.58.31
अभिपत्याशु तद्वक्रं निर्गतो ऽहं ततः क्षणात् ।अब्रवीत् सुरसा देवी स्वेन रूपेण मां पुनः॥
abhipatyāśu tadvakraṃ nirgato 'haṃ tataḥ kṣaṇāt |abravīt surasā devī svena rūpeṇa māṃ punaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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