वाल्मीकि रामायण 5.58.38
प्रहस्य च महानादमुक्तो ऽहं भीमया तया ।अवस्थितमसम्भ्रान्तमिदं वाक्यमशोभनम्॥
prahasya ca mahānādamukto 'haṃ bhīmayā tayā |avasthitamasambhrāntamidaṃ vākyamaśobhanam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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