वाल्मीकि रामायण 5.58.42
ततो ऽहं विपुलं रूपं संक्षिप्य निमिषान्तरात् ।तस्या हृदयमादाय प्रपतामि नभःस्थलम्॥
tato 'haṃ vipulaṃ rūpaṃ saṃkṣipya nimiṣāntarāt |tasyā hṛdayamādāya prapatāmi nabhaḥsthalam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें