वाल्मीकि रामायण 5.58.46
दक्षिणं तीरमुदधेर्लङ्का यत्र च सा पुरी ।अस्तं दिनकरे याते रक्षसां निलयं पुरम् ।प्रविष्टो ऽहमविज्ञातो रक्षोभि र्भीमविक्रमैः॥
dakṣiṇaṃ tīramudadherlaṅkā yatra ca sā purī |astaṃ dinakare yāte rakṣasāṃ nilayaṃ puram |praviṣṭo 'hamavijñāto rakṣobhi rbhīmavikramaiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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