वाल्मीकि रामायण 5.58.51
तत्राहं सर्वरात्रं तु विचिन्वन् जनकात्मजाम् ।रावणान्तःपुरगतो न चापश्यं सुमध्यमाम्॥
tatrāhaṃ sarvarātraṃ tu vicinvan janakātmajām |rāvaṇāntaḥpuragato na cāpaśyaṃ sumadhyamām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें