वाल्मीकि रामायण 5.58.53
शोचता च मया दृष्टं प्राकारेण समावृतम् ।काञ्चनेन विकृष्टेन गृहोपवनमुत्तमम्॥
śocatā ca mayā dṛṣṭaṃ prākāreṇa samāvṛtam |kāñcanena vikṛṣṭena gṛhopavanamuttamam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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