वाल्मीकि रामायण 5.58.66
वित्रस्तां परमोद्विग्नां वीक्षमाणां ततस्ततः ।त्राणं किंचिदपश्यन्तीं वेपमानां तपस्विनीम्॥
vitrastāṃ paramodvignāṃ vīkṣamāṇāṃ tatastataḥ |trāṇaṃ kiṃcidapaśyantīṃ vepamānāṃ tapasvinīm ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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