वाल्मीकि रामायण 5.58.85
जनकस्यात्मजा साध्वी स्नुषा दशरथस्य च ।स्वप्नो ह्यद्य मया दृष्टो दारुणो रोमहर्षणः॥
janakasyātmajā sādhvī snuṣā daśarathasya ca |svapno hyadya mayā dṛṣṭo dāruṇo romaharṣaṇaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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