वाल्मीकि रामायण 5.58.88
यस्या ह्येवंविधः स्वप्नो दुःखितायाः प्रदृश्यते ।सा दुःखैर्विविधैर्मुक्ता सुखमाप्नोत्यनुत्तमम्॥
yasyā hyevaṃvidhaḥ svapno duḥkhitāyāḥ pradṛśyate |sā duḥkhairvividhairmuktā sukhamāpnotyanuttamam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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