वाल्मीकि रामायण 5.59.21
एतावेव हि संक्रुद्धौ सवाजिरथकुञ्जराम् ।लङ्कां नाशयितुं शक्तौ सर्वे तिष्ठन्तु वानराः॥
etāveva hi saṃkruddhau savājirathakuñjarām |laṅkāṃ nāśayituṃ śaktau sarve tiṣṭhantu vānarāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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