वाल्मीकि रामायण 5.59.7
अहमेको ऽपि पर्याप्तः सराक्षसगणां पुरीम् ।तां लङ्कां तपसा हन्तुं रावणं च महाबलम्॥
ahameko 'pi paryāptaḥ sarākṣasagaṇāṃ purīm |tāṃ laṅkāṃ tapasā hantuṃ rāvaṇaṃ ca mahābalam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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