वाल्मीकि रामायण 5.60.6
तमेवं कृतसङ्कल्पं जाम्बवान् हरिसत्तमः ।उवाच परमप्रीतो वाक्यमर्थवदर्थवित्॥
tamevaṃ kṛtasaṅkalpaṃ jāmbavān harisattamaḥ |uvāca paramaprīto vākyamarthavadarthavit ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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