वाल्मीकि रामायण 5.62.2
श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं हरीणां प्रवरो ऽङ्गदः ।प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा पिबन्तु हरयो मधु॥
śrutvā hanumato vākyaṃ harīṇāṃ pravaro 'ṅgadaḥ |pratyuvāca prasannātmā pibantu harayo madhu ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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