वाल्मीकि रामायण 5.62.27
मदान्धश्च न वेदैनमार्यको ऽयं ममेति सः ।अथैनं निष्पिपेषाशु वेगवद्वसुधातले॥
madāndhaśca na vedainamāryako 'yaṃ mameti saḥ |athainaṃ niṣpipeṣāśu vegavadvasudhātale ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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