वाल्मीकि रामायण 5.67.12
स दर्भं संस्तराद् गृह्य ब्रह्मास्त्रेण ह्ययोजयः ।स दीप्त इव कालाग्निर्जज्वालाभिमुखः खगम्॥
sa darbhaṃ saṃstarād gṛhya brahmāstreṇa hyayojayaḥ |sa dīpta iva kālāgnirjajvālābhimukhaḥ khagam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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