वाल्मीकि रामायण 5.67.17
मोघमस्त्रं न शक्यं तु कर्तुमित्येव राघव ।भवांस्तस्याक्षि काकस्य हिनस्ति स्म स दक्षिणम्॥
moghamastraṃ na śakyaṃ tu kartumityeva rāghava |bhavāṃstasyākṣi kākasya hinasti sma sa dakṣiṇam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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