वाल्मीकि रामायण 5.67.32
प्रतिगृह्य मणिं दिव्यं तव हेतो रघूद्वह ।शिरसा तां प्रणम्यार्यामहमागमने त्वरे॥
pratigṛhya maṇiṃ divyaṃ tava heto raghūdvaha |śirasā tāṃ praṇamyāryāmahamāgamane tvare ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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