वाल्मीकि रामायण 5.67.8
नखाग्रैः केन ते भीरु दारितं तु स्तनान्तरम् ।कः क्रीडति सरोषेण पञ्चवक्त्रेण भोगिना॥
nakhāgraiḥ kena te bhīru dāritaṃ tu stanāntaram |kaḥ krīḍati saroṣeṇa pañcavaktreṇa bhoginā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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