वाल्मीकि रामायण 6.10.4
मत्तमातज्~गनिःश्वासैर्व्याकुलीकृतमारुतम् ।शज्~खघोषमहाघोषम् तूर्यसम्बाधनादितम्॥
mattamātaj~ganiḥśvāsairvyākulīkṛtamārutam |śaj~khaghoṣamahāghoṣam tūryasambādhanāditam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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