वाल्मीकि रामायण 6.101.15
सारथेश्चापि बाणेन शिरो ज्वलितकुण्डलम् ।जहार लक्ष्मणः श्रीमान् नैर्ऋतस्य महाबलः॥
sāratheścāpi bāṇena śiro jvalitakuṇḍalam |jahāra lakṣmaṇaḥ śrīmān nairṛtasya mahābalaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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