वाल्मीकि रामायण 6.101.27
मोक्षितं भ्रातरं दृष्ट्वा लक्ष्मणेन स रावणः ।लक्ष्मणाभिमुखस्तिष्ठन्निदं वचनमब्रवीत्॥
mokṣitaṃ bhrātaraṃ dṛṣṭvā lakṣmaṇena sa rāvaṇaḥ |lakṣmaṇābhimukhastiṣṭhannidaṃ vacanamabravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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