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वाल्मीकि रामायण 6.101.43
सौमित्रिं सा विनिर्भिद्य प्रविष्टा धरणीतलम्॥
saumitriṃ sā vinirbhidya praviṣṭā dharaṇītalam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलेंसौमित्रिं सा विनिर्भिद्य प्रविष्टा धरणीतलम्॥
saumitriṃ sā vinirbhidya praviṣṭā dharaṇītalam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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