वाल्मीकि रामायण 6.101.54
चक्षुर्विषयमागम्य नायं जीवितुमर्हति ।दृष्टिं दृष्टिविषस्येव सर्पस्य मम रावणः॥
cakṣurviṣayamāgamya nāyaṃ jīvitumarhati |dṛṣṭiṃ dṛṣṭiviṣasyeva sarpasya mama rāvaṇaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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