वाल्मीकि रामायण 6.101.8
तैरासीद्गगनं दीप्तं सम्पतद्भिरितस्ततः ।पतद्भिश्च दिशो दीप्ताश्चन्द्रसूर्यग्रहैरिव॥
tairāsīdgaganaṃ dīptaṃ sampatadbhiritastataḥ |patadbhiśca diśo dīptāścandrasūryagrahairiva ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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