वाल्मीकि रामायण 6.102.15
एवं न विद्यते रूपं गतासूनां विशाम्पते ।दीर्घायुषस्तु ये मर्त्यास्तेषां तु मुखमीद्दशम्॥
evaṃ na vidyate rūpaṃ gatāsūnāṃ viśāmpate |dīrghāyuṣastu ye martyāsteṣāṃ tu mukhamīddaśam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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