वाल्मीकि रामायण 6.102.17
आख्यास्यते प्रसुप्तस्य स्रस्तगात्रस्य भूतले ।सोच्छ्वासं हृदयं वीर कम्पमानं मुहुर्मुहुः॥
ākhyāsyate prasuptasya srastagātrasya bhūtale |socchvāsaṃ hṛdayaṃ vīra kampamānaṃ muhurmuhuḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें