वाल्मीकि रामायण 6.102.2
स दत्त्वा तुमुलं युद्धं रावणस्य दुरात्मनः ।विसृजन्नेव बाणौघान् सुषेणं वाक्यमब्रवीत्॥
sa dattvā tumulaṃ yuddhaṃ rāvaṇasya durātmanaḥ |visṛjanneva bāṇaughān suṣeṇaṃ vākyamabravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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