वाल्मीकि रामायण 6.102.25
इति सञ्चिन्त्य हनुमान् गत्वा क्षिप्रं महाबलः ।आसाद्य पर्वतश्रेष्ठं त्रिः प्रकम्प्य गिरेः शिरः॥
iti sañcintya hanumān gatvā kṣipraṃ mahābalaḥ |āsādya parvataśreṣṭhaṃ triḥ prakampya gireḥ śiraḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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