वाल्मीकि रामायण 6.105.14
भिन्नमर्याद निर्लज्ज चारित्रेष्वनवस्थित ।दर्पान्मृत्युमुपादाय शूरो ऽहमिति मन्यसे॥
bhinnamaryāda nirlajja cāritreṣvanavasthita |darpānmṛtyumupādāya śūro 'hamiti manyase ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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