वाल्मीकि रामायण 6.105.22
अद्य मद्बाणभिन्नस्य गतासोः पतितस्य ते ।कर्षन्त्वन्त्राणि पतगा गरुत्मन्त इवोरगान्॥
adya madbāṇabhinnasya gatāsoḥ patitasya te |karṣantvantrāṇi patagā garutmanta ivoragān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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