वाल्मीकि रामायण 6.107.23
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥
eṣa supteṣu jāgarti bhūteṣu pariniṣṭhitaḥ |eṣa evāgnihotraṃ ca phalaṃ caivāgnihotriṇām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें