वाल्मीकि रामायण 6.107.4
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम्॥
ādityahṛdayaṃ puṇyaṃ sarvaśatruvināśanam |jayāvahaṃ japennityamakṣayyaṃ paramaṃ śivam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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