वाल्मीकि रामायण 6.108.11
अविक्लवमसम्भ्रान्तमव्यग्रहृदयेक्षणम् ।रश्मिसञ्चारनियतं प्रचोदय रथं द्रुतम्॥
aviklavamasambhrāntamavyagrahṛdayekṣaṇam |raśmisañcāraniyataṃ pracodaya rathaṃ drutam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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