वाल्मीकि रामायण 6.108.14
अपसव्यं ततः कुर्वन् रावणस्य महारथम् ।चक्रोत्क्षिप्तेन रजसा रावणं व्यवधानयत्॥
apasavyaṃ tataḥ kurvan rāvaṇasya mahāratham |cakrotkṣiptena rajasā rāvaṇaṃ vyavadhānayat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें