वाल्मीकि रामायण 6.108.26
गृध्रैरनुगताश्चास्य वमन्त्यो ज्वलनं मुखैः ।प्रणेदुर्मुखमीक्षन्त्यः संरब्धमशिवं शिवाः॥
gṛdhrairanugatāścāsya vamantyo jvalanaṃ mukhaiḥ |praṇedurmukhamīkṣantyaḥ saṃrabdhamaśivaṃ śivāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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