वाल्मीकि रामायण 6.112.12
पराक्रमोत्साहविजृम्भितार्चिर्निश्वासधूमः स्वबलप्रतापः ।प्रतापवान् संयति राक्षसाग्निर्निर्वापितो रामपयोधरेण॥
parākramotsāhavijṛmbhitārcirniśvāsadhūmaḥ svabalapratāpaḥ |pratāpavān saṃyati rākṣasāgnirnirvāpito rāmapayodhareṇa ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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