वाल्मीकि रामायण 6.112.15
नायं विनष्टो निश्चेष्टः समरे चण्डविक्रमः ।अत्युन्नतमहोत्साहः पतितो ऽयमशङ्कितः॥
nāyaṃ vinaṣṭo niśceṣṭaḥ samare caṇḍavikramaḥ |atyunnatamahotsāhaḥ patito 'yamaśaṅkitaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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