वाल्मीकि रामायण 6.112.9
किं शेषमिव लोकस्य हतवीरस्य साम्प्रतम् ।रणे राक्षसशार्दूले प्रसुप्त इव पांसुषु॥
kiṃ śeṣamiva lokasya hatavīrasya sāmpratam |raṇe rākṣasaśārdūle prasupta iva pāṃsuṣu ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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