वाल्मीकि रामायण 6.115.5
राघवेणाभ्यनुज्ञातो मातलिः शक्रसारथिः ।दिव्यं तं रथमास्थाय दिवमेवारुरोह सः॥
rāghaveṇābhyanujñāto mātaliḥ śakrasārathiḥ |divyaṃ taṃ rathamāsthāya divamevāruroha saḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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