वाल्मीकि रामायण 6.115.6
तस्मिंस्तु दिवमारूढे सुरसारथिसत्तमे ।राघवः परमप्रीतः सुग्रीवं परिषस्वजे॥
tasmiṃstu divamārūḍhe surasārathisattame |rāghavaḥ paramaprītaḥ sugrīvaṃ pariṣasvaje ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें