वाल्मीकि रामायण 6.116.12
मया ह्यलब्धनिद्रेण दृढेन तव निर्जये ।प्रतिज्ञैषा विनिस्तीर्णा बद्ध्वा सेतुं महोदधौ॥
mayā hyalabdhanidreṇa dṛḍhena tava nirjaye |pratijñaiṣā vinistīrṇā baddhvā setuṃ mahodadhau ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें