वाल्मीकि रामायण 6.116.14
तदाश्वसिहि विश्वस्ता स्वगृहे परिवर्तसे ।अयं चाभ्येति संहृष्टस्त्वद्दर्शनसमुत्सुकः॥
tadāśvasihi viśvastā svagṛhe parivartase |ayaṃ cābhyeti saṃhṛṣṭastvaddarśanasamutsukaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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