वाल्मीकि रामायण 6.116.18
प्रियमेतदुपश्रुत्य भर्तुर्विजयसंश्रितम् ।प्रहर्षवशमापन्ना निर्वाक्या ऽस्मि क्षणान्तरम्॥
priyametadupaśrutya bharturvijayasaṃśritam |praharṣavaśamāpannā nirvākyā 'smi kṣaṇāntaram ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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